अध्याय 3 - शरद जोशी
Reprint 2025-26
हिंदी साहित्य में व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में शरद जोशी जी का अमूल्य योगदान है। "तुम कब जाओगे, अतिथि" उनका एक प्रसिद्ध व्यंग्य लेख है जो सामाजिक शिष्टाचार और आतिथ्य की परंपरा पर एक हास्यपूर्ण टिप्पणी है।
इस इंटरैक्टिव पाठ में हम शरद जोशी के जीवन, उनकी लेखन शैली और इस व्यंग्य लेख का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इस रचना के माध्यम से हम भारतीय सामाजिक परंपराओं और आधुनिक जीवन की चुनौतियों को समझेंगे।
भारतीय संस्कृति में अतिथि देवो भव की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हमारे यहाँ अतिथि का स्वागत और सत्कार एक पवित्र कर्तव्य माना जाता है। परंतु आधुनिक जीवन की व्यस्तता और बदलती जीवनशैली के कारण कभी-कभी यह परंपरा एक समस्या का रूप भी ले लेती है।
शरद जोशी जी ने इसी स्थिति को अपने व्यंग्य लेख "तुम कब जाओगे, अतिथि" में बहुत ही सहजता और हास्य के साथ प्रस्तुत किया है। यह लेख एक ऐसे अतिथि की कहानी है जो अपने मेजबान के घर आवश्यकता से अधिक समय तक रुक जाता है।
इस व्यंग्य के माध्यम से लेखक ने आधुनिक समाज की उन समस्याओं को उजागर किया है जो पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली के टकराव से उत्पन्न होती हैं।
आपके अनुसार, आधुनिक युग में "अतिथि देवो भव" की उक्ति की क्या प्रासंगिकता है? अपने विचार व्यक्त कीजिए।
लेख में प्रयुक्त शब्दों के पर्याय और मुहावरों का अध्ययन कीजिए:
"अतिथि" का पर्याय है
"सत्कार" का पर्याय है
"आगमन" का पर्याय है
"मेजबान" का पर्याय है
"सहनशीलता" का पर्याय है
निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए:
1. "तुम कब जाओगे, अतिथि?" (नकारात्मक वाक्य में बदलिए)
2. "अतिथि सदैव देवता नहीं होता।" (प्रश्नवाचक वाक्य में बदलिए)
3. "मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी।" (भूतकाल में बदलिए)
पाठ की समझ के बारे में निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें:
निम्नलिखित प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त कीजिए:
शरद जोशी को हिंदी व्यंग्य साहित्य का बादशाह कहा जाता है। उन्होंने न केवल पुस्तकें लिखीं बल्कि रेडियो और टेलीविजन के लिए भी कार्यक्रम तैयार किए। उनके व्यंग्य हमेशा मानवीयता और करुणा से भरे होते थे।
"अतिथि देवो भव" भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, लेकिन आधुनिक जीवन में इसका व्यावहारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। शरद जोशी ने इसी द्वंद को बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया है।